न्यूज स्कूप : भक्ति, अनुशासन और निर्भयता के प्रतीक भगवान कालभैरव की जयंती इस वर्ष 12 नवंबर, बुधवार को श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जाएगी। हिन्दू पंचांग के अनुसार, मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान शिव के प्रचंड क्रोध से कालभैरव देव प्रकट हुए थे। इस शुभ अवसर को कालभैरव जयंती के रूप में जाना जाता है, जो सृष्टि में संतुलन, न्याय और धर्म की पुनर्स्थापना की याद दिलाता है।
यह तिथि केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह हमें यह भी स्मरण कराती है कि जीवन में भय, अहंकार और अन्याय पर संयम, सत्य और श्रद्धा की विजय ही सच्ची साधना है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन कालभैरव देव की आराधना से भक्तों को असीम साहस, आत्मबल और रक्षण की प्राप्ति होती है।
कालभैरव अवतरण की पौराणिक कथा
प्राचीन ग्रंथों और शिवपुराण में कालभैरव के अवतरण की कथा का विस्तार से वर्णन मिलता है:
कथा के अनुसार, एक बार देवताओं के बीच यह गंभीर प्रश्न उठा कि त्रिदेव—ब्रह्मा, विष्णु और महेश में सबसे अधिक श्रेष्ठ कौन है। इस प्रश्न पर मतभेद उत्पन्न हुआ। इसी दौरान, ब्रह्मा जी ने स्वयं को सर्वोच्च घोषित कर दिया और अहंकारवश भगवान शिव के प्रति कुछ अपमानजनक और तिरस्कारपूर्ण बातें कहीं।
ब्रह्मा जी के इस अभिमान और अनादर को सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो उठे। उनकी क्रोधाग्नि इतनी प्रचंड थी कि उनके तीसरे नेत्र से एक विशाल ज्योति प्रकट हुई, और उसी ज्योति से भगवान कालभैरव का विकराल अवतार हुआ।
अहंकार पर विजय का प्रतीक
भगवान कालभैरव का जन्म मुख्य रूप से ब्रह्मा जी के अहंकार को समाप्त करने और सृष्टि में नैतिक संतुलन स्थापित करने के लिए हुआ था। जब ब्रह्मा जी ने अपने क्रोध और अभिमान में सभी सीमाएं लांघ दीं, तब कालभैरव ने अपने त्रिशूल से उनके पाँच में से एक सिर को अलग कर दिया।
यह घटना केवल एक दंड नहीं थी, बल्कि यह अहंकार पर विनम्रता और सत्य की विजय का एक सशक्त प्रतीक बनी। तभी से मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कालभैरव के प्रकट होने का दिवस, कालभैरव जयंती, बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।
काशी के कोतवाल और रक्षक देवता
धार्मिक ग्रंथों में यह भी उल्लेख है कि जब भगवान शिव ने काशी को मोक्षभूमि घोषित किया, तब उन्होंने इस पवित्र नगरी की रक्षा का सम्पूर्ण भार कालभैरव देव को सौंपा। तभी से वे काशी के कोतवाल (Guard/Ruler) और रक्षक देवता माने जाते हैं।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, ऐसा विश्वास है कि जब तक कोई भक्त कालभैरव देव के दर्शन और पूजा नहीं कर लेता, तब तक उसकी काशी यात्रा अधूरी मानी जाती है। श्रद्धालु पहले कालभैरव मंदिर में पूजा करते हैं, और उसके बाद ही काशी विश्वनाथ तथा माता अन्नपूर्णा के दर्शन के लिए आगे बढ़ते हैं।
यह परंपरा एक गहरा आध्यात्मिक संदेश देती है कि मोक्ष की नगरी में प्रवेश से पहले, व्यक्ति को अपने भीतर के भय, अहंकार और नकारात्मकता का त्याग करना आवश्यक है। भगवान कालभैरव यही सिखाते हैं कि सच्चा भक्त वही है जो संयम, श्रद्धा और विनम्रता के साथ धर्म के मार्ग पर अडिग रहता है।

