न्यूज स्कूप : उत्तर प्रदेश के अयोध्या में आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वज फहराए जाने के ऐतिहासिक कार्यक्रम के बाद एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। स्थानीय सांसद और समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता अवधेश प्रसाद को इस भव्य अनुष्ठान में आमंत्रित नहीं किया गया, जिस पर उन्होंने अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
अवधेश प्रसाद ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए सीधा आरोप लगाया है कि उन्हें रामलला के दरबार में धर्म ध्वजा स्थापना कार्यक्रम में न बुलाए जाने का कारण उनका दलित समाज से होना है।
अवधेश प्रसाद अयोध्या निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि मंदिर निर्माण के औपचारिक समापन के इस महत्वपूर्ण क्षण में उन्हें आमंत्रित किया जाएगा। कार्यक्रम में शामिल न होने के बाद उन्होंने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए लिखा:
“रामलला के दरबार में धर्म ध्वजा स्थापना कार्यक्रम में मुझे न बुलाए जाने का कारण मेरा दलित समाज से होना है, तो यह राम की मर्यादा नहीं, किसी ओर की संकीर्ण सोच का परिचय है। राम सबके हैं।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी यह लड़ाई पद या निमंत्रण के लिए नहीं है, बल्कि यह “सम्मान, बराबरी और संविधान की मर्यादा की है।”
यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैदिक मंत्रोच्चार और ‘जय श्री राम’ के नारों के बीच केसरिया ध्वज फहराया, जिसे मंदिर के निर्माण का औपचारिक समापन माना गया। इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी मौजूद थे।
पीएम मोदी ने इस अनुष्ठान को ‘युगांतकारी’ की संज्ञा देते हुए कहा था कि ‘सदियों के जख्म और दर्द भर रहे हैं’ क्योंकि 500 साल पुराना संकल्प पूरा हो रहा है। हालांकि, स्थानीय दलित सांसद का बहिष्कार किए जाने का आरोप इस भव्य और एकता के संदेश को कुछ हद तक प्रभावित करता है।
अवधेश प्रसाद ने ध्वजारोहण से ठीक एक दिन पहले, 24 नवंबर को ही सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी थी कि उन्हें अभी तक कार्यक्रम के लिए कोई निमंत्रण नहीं मिला है। अपनी आस्था व्यक्त करते हुए उन्होंने तब यह भी कहा था कि “यदि मुझे न्योता मिला तो सारा काम धाम छोड़कर मैं नंगे पैर ही वहां जाऊंगा।” स्थानीय सांसद की सार्वजनिक इच्छा जताने के बाद भी उन्हें कार्यक्रम में नहीं बुलाया गया।
इस घटना ने अब अयोध्या की राजनीति और सामाजिक चर्चाओं में एक नया आयाम जोड़ दिया है, जहां एक ओर भव्य मंदिर निर्माण की खुशी है, वहीं दूसरी ओर ‘सम्मान और समावेश’ के सवालों पर बहस छिड़ गई है।
