न्यूज स्कूप : धान की कटाई का सीजन 2025 खत्म होने के साथ ही, कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट (CAQM) ने महत्वपूर्ण डेटा जारी किया है, जो पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में आई रिकॉर्ड गिरावट को दर्शाता है। CAQM के मुताबिक, ISRO के बनाए स्टैंडर्ड प्रोटोकॉल के तहत हर साल 15 सितंबर से 30 नवंबर तक धान की पराली जलाने की घटनाओं की ऑफिशियल रिकॉर्डिंग का समय भी खत्म हो गया है।
आंकड़ों के अनुसार, यह गिरावट हाल के सालों में दर्ज की गई सबसे बड़ी गिरावट है, जो इस इलाके में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए कमीशन के कोऑर्डिनेटेड फ्रेमवर्क की सफलता को दिखाता है।
CAQM के अनुसार, 2025 का धान की कटाई का मौसम आग लगने की सबसे कम घटनाओं के लिए दर्ज किया जाएगा। गिरावट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
| राज्य | कुल घटनाएँ (2025) | 2024 की तुलना में कमी | 2021 की तुलना में कमी |
| पंजाब | 5,114 | 53% | 93% |
| हरियाणा | 662 | 53% | 91% |
पंजाब में 2021 की तुलना में 93% और हरियाणा में 91% की भारी कमी दर्ज की गई है। ये आंकड़े CAQM द्वारा अपने एक्शन प्लान के अनुसार राज्य-विशिष्ट फसल अवशेष प्रबंधन उपायों की निगरानी शुरू करने के बाद से हासिल की गई सबसे बड़ी गिरावट दिखाते हैं।
पंजाब और हरियाणा में यह अभूतपूर्व गिरावट कई समन्वित प्रयासों का परिणाम है:
- CRM मशीनरी: राज्य और जिले के खास एक्शन प्लान को लागू किया गया, जिसमें बड़े पैमाने पर फसल अवशेष मैनेजमेंट (CRM) मशीनरी की तैनाती की गई।
- Ex-situ उपयोग पर जोर: धान की पराली का बेहतर एक्स-सिटू (खेतों से बाहर) इस्तेमाल सुनिश्चित किया गया। इसमें बायोमास से एनर्जी बनाना, इंडस्ट्रियल बॉयलर में इस्तेमाल, बायो-इथेनॉल बनाना, TPPs (Thermal Power Plants) और ईंट भट्टों में को-फायरिंग के लिए धान की पराली के पेलेट्स/ब्रिकेट्स का इस्तेमाल जरूरी करना शामिल है।
- फील्ड कोऑर्डिनेशन: राज्य के कृषि विभागों, ज़िला प्रशासनों और आयोग के बीच लगातार तालमेल से, जहां भी आग लगने की बड़ी घटनाएं रिपोर्ट हुईं, समय पर सुधारात्मक कार्रवाई सुनिश्चित हुई।
- जागरूकता: फ्लाइंग स्क्वॉड, पराली प्रोटेक्शन फोर्स, फील्ड अधिकारियों द्वारा जमीनी स्तर पर जांच और हॉटस्पॉट ज़िलों में लगातार निगरानी के साथ-साथ किसानों के लिए खास IEC (Information, Education and Communication) कैंपेन और जागरूकता प्रोग्राम ने भी अहम भूमिका निभाई।
इसके अतिरिक्त, पराली के मैनेजमेंट और प्रदूषण गतिविधियों की साल भर निगरानी पर ध्यान देने के लिए चंडीगढ़ में एक खास CAQM सेल बनाया गया है।
CAQM की रिपोर्ट के अनुसार, खेतों में आग लगने की घटनाओं में काफी कमी आई है, जिससे दिल्ली-NCR में पराली जलाने से होने वाली संभावित खराब स्थिति काफी हद तक कम हो गई है।
हालांकि, इस बीच एक बड़ा सवाल यह खड़ा हो रहा है कि जब लगातार दिल्ली में प्रदूषण को लेकर सियासत चल रही है और बार-बार पराली को इसकी एक बड़ी वजह बताया जाता है, लेकिन CAQM के आंकड़ों के मुताबिक पड़ोसी राज्य हरियाणा और पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में रिकॉर्ड कमी आई है। तो दिल्ली की आबोहवा अभी भी इतनी प्रदूषित और दमघोंटू क्यों है? यह सवाल अब प्रदूषण के अन्य स्थानीय और मौसमी कारणों पर ध्यान केंद्रित करने की मांग करता है।
