न्यूज स्कूप : वर्तमान में कलयुग का दूसरा चरण चल रहा है, जिसका प्रभाव साफ तौर पर महसूस किया जा सकता है। लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी कि धरती पर एक ऐसी जगह भी मौजूद है, जो पूरी तरह से कलयुग के प्रभाव से मुक्त है। यह न केवल एक पवित्र तीर्थ स्थल है, बल्कि ऐसी मान्यता है कि इस स्थान के दर्शन के बिना देश की प्रसिद्ध चार धाम की यात्रा अधूरी मानी जाती है।
यह पावन तीर्थ स्थल उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में स्थित नैमिषारण्य है, जिसे नैमिष या नीमषार के नाम से भी जाना जाता है।
इस महान तीर्थ स्थल का वर्णन वेद-पुराणों से लेकर तमाम धार्मिक ग्रंथों में देखने को मिलता है। नैमिषारण्य कई युगों से ज्ञान, तप और भक्ति का केंद्र रहा है:
- तपोभूमि: प्राचीन काल में, इसी जगह पर 88 हजार ऋषि-मुनियों ने एक साथ कठिन तपस्या की थी। यही कारण है कि इसे तपोभूमि के नाम से भी प्रख्यात है।
- पुराणों की रचना: धार्मिक मान्यता के अनुसार, नैमिषारण्य ही वह स्थान है, जहाँ महापुराणों की रचना की गई थी।
- ब्रह्मा जी का कथन: मान्यताओं के मुताबिक, सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी ने स्वयं इस जगह को ध्यान योग करने के लिए सबसे उत्तम स्थान बताया था।
- महाभारत काल में आगमन: महाभारत काल में पांडु पुत्र अर्जुन और युधिष्ठिर भी अपने तीर्थ यात्रा के दौरान इस स्थान पर आए थे।
नैमिषारण्य तीर्थ स्थल लखनऊ से करीब 80 किलोमीटर दूर गोमती नदी के तट पर स्थित है। यह स्थान न केवल धार्मिक रूप से, बल्कि अपनी ऐतिहासिक संरचनाओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र है।
नैमिषारण्य स्थान के मुख्य आकर्षणों में शामिल हैं:
- चक्रतीर्थी: यह एक प्रमुख सरोवर है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे स्वयं ब्रह्मा जी ने अपने चक्र से बनाया था।
- व्यास गद्दी: वह स्थान जहाँ बैठकर ऋषि वेद व्यास ने ज्ञान दिया था।
- ललिता देवी का मंदिर: नैमिषारण्य में स्थित 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
- पंचप्रयाग सरोवर: यह एक पक्का सरोवर है, जिसके किनारे 5099 साल पुराना अक्षय वट का पेड़ है।
- अन्य स्थल: यहाँ भूतेश्वनाथ मंदिर, हवन कुंड, शेष मंदिर, हनुमान गढ़ी, पंच पांडव मंदिर, पंचपुराण मंदिर, रामानुज कोट और रुद्रावर्त जैसे कई अन्य प्रमुख मंदिर और आश्रम भी हैं।
नैमिषारण्य आने वाले भक्त इसकी परिक्रमा ज़रूर करते हैं। यह परिक्रमा 84 कोस (लगभग 270 किलोमीटर) की है। यह पवित्र परिक्रमा हर वर्ष फाल्गुन मास की अमावस्या के बाद प्रतिपदा की तिथि से लेकर पूर्णिमा तक की जाती है, जिसमें लाखों श्रद्धालु हिस्सा लेते हैं।
