न्यूज स्कूप : उत्तर भारत का ‘सुरक्षा कवच’ कही जाने वाली अरावली पर्वतमाला आज अपने अस्तित्व की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में फैली यह प्राचीन पर्वत श्रृंखला अवैध खनन और बदलती सरकारी नीतियों के कारण सिमटती जा रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की नई परिभाषा को मंजूरी दिए जाने के बाद एक बार फिर विकास बनाम पर्यावरण की बहस तेज हो गई है।
अरावली न केवल थार मरुस्थल को बढ़ने से रोकती है, बल्कि दिल्ली-एनसीआर के लिए जल पुनर्भरण (Water Recharge) का मुख्य स्रोत भी है। आइए समझते हैं 1990 के दशक से अब तक इस विवाद की पूरी क्रोनोलॉजी और हालिया बदलावों का प्रभाव।
- 1990 का दशक: अरावली में अवैध खनन की खबरें सुर्खियां बनने लगीं। पर्यावरण क्षरण और गिरते जलस्तर ने अदालतों का दरवाजा खटखटाया।
- 2002-2003 (प्रतिबंध और राहत): सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी (CEC) की जांच के बाद अक्टूबर 2002 में हरियाणा और राजस्थान में खनन पर पूर्ण रोक लगा दी गई। हालांकि, तत्कालीन गहलोत सरकार की अपील पर कोर्ट ने पुराने पट्टों को चालू रखने की अनुमति दी।
- मर्फी फॉर्मूला (2003): राजस्थान सरकार ने अमेरिकी विशेषज्ञ रिचर्ड मर्फी के सिद्धांत को अपनाया। इसके तहत समुद्र तल से 100 मीटर या अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ी को ही ‘अरावली’ माना गया। इससे 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियां खनन के लिए वैध हो गईं।
- वसुंधरा राजे शासन और 2005 का स्टे: 2003 में सत्ता बदलने के बाद मर्फी फॉर्मूले के आधार पर कई पट्टे जारी हुए। लेकिन बंधुआ मुक्ति मोर्चा की याचिका पर 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने बिना पर्यावरणीय मूल्यांकन के नए पट्टों पर रोक लगा दी।
- 2009-2010 (पूर्ण प्रतिबंध और चौंकाने वाली रिपोर्ट): कोर्ट ने हरियाणा के फरीदाबाद, गुरुग्राम और मेवात में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित किया। 2010 में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ने खुलासा किया कि अलवर और सिरोही में पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं।
नवंबर 2025 में केंद्र सरकार ने अरावली की नई परिभाषा पेश की, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को मंजूरी दे दी। इस फैसले ने पर्यावरणविदों की नींद उड़ा दी है।
- पॉलीगॉन लाइन (2008 का आधार): पहले 100 मीटर से ऊंची दो पहाड़ियों के बीच की छोटी पहाड़ियों को भी अरावली का हिस्सा (पॉलीगॉन) मानकर संरक्षित किया जाता था।
- कंटूर लाइन (2025 का आधार): अब इसे बदलकर कंटूर लाइन कर दिया गया है। इसके तहत पहाड़ियों की समान लाइन में आने वाली छोटी पहाड़ियों को ‘कंटूर’ माना जाएगा और वहां खनन की अनुमति होगी।
विशेषज्ञों की चेतावनी: पर्यावरणविदों का तर्क है कि यह तकनीकी बदलाव अरावली के लगभग 90 प्रतिशत हिस्से को खनन के लिए खोल सकता है। हालांकि, सरकार का दावा है कि खनन केवल 0.19 प्रतिशत के सीमित क्षेत्र में होगा।
अरावली का नष्ट होना केवल पहाड़ों का खत्म होना नहीं है:
- जल संकट: अरावली पहाड़ियां प्राकृतिक बांध की तरह काम करती हैं जो बारिश के पानी को जमीन के नीचे भेजती हैं। इनके खत्म होने से गुड़गांव और दिल्ली में भूजल स्तर और नीचे चला जाएगा।
- धूल भरी आंधियां: अरावली राजस्थान के मरुस्थल और दिल्ली के बीच एक दीवार है। पहाड़ गायब होने से रेगिस्तानी धूल सीधे एनसीआर में प्रवेश करेगी, जिससे वायु प्रदूषण जानलेवा हो सकता है।
अरावली का मुद्दा अब केवल अदालती कमरों तक सीमित नहीं है, यह एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है। एक तरफ खनन लॉबी की आर्थिक ताकत है, तो दूसरी तरफ पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की जद्दोजहद। सुप्रीम कोर्ट के हालिया रुख से उम्मीद तो है, लेकिन ‘कंटूर लाइन’ जैसे बदलावों की जमीनी हकीकत डराने वाली है।
