न्यूज स्कूप : देश की राजधानी दिल्ली के लिए साल 2025 प्रदूषण के मोर्चे पर एक विरोधाभासी साल रहा है। एक तरफ जहां दिल्लीवासियों को पिछले कई दिनों से ‘गंभीर’ श्रेणी के स्मॉग और धुंध का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ सालाना आंकड़ों की नजर से देखें तो दिल्ली की हवा पिछले 5 सालों में सबसे बेहतर स्थिति में रही है। साल 2020 के बाद 2025 वह साल बना है जिसमें औसत वायु प्रदूषण सबसे कम दर्ज किया गया।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि यह ‘सुधार’ केवल तुलनात्मक है। असलियत यह है कि दिल्ली के लोग जिस हवा में सांस ले रहे हैं, वह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के सुरक्षा मानकों से कई गुना अधिक जहरीली बनी हुई है।
थिंक टैंक EnviroCatalysts द्वारा सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के अध्ययन में कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं:
- PM2.5 का स्तर: साल 2025 (29 दिसंबर तक) में PM2.5 की औसत मात्रा 98 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर रही।
- यह भारत के राष्ट्रीय मानक (40 µg/m³) से 2.45 गुना अधिक है।
- यह WHO के सुरक्षा मानक (5 µg/m³) से 19.6 गुना अधिक खतरनाक है।
- PM10 का स्तर: इस साल PM10 की औसत मात्रा 200 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर दर्ज की गई।
- यह राष्ट्रीय औसत (60 µg/m³) से 3.3 गुना ज्यादा है।
- यह WHO की गाइडलाइन (15 µg/m³) से 13.33 गुना अधिक है।
विशेषज्ञों के अनुसार, 2023 और 2024 की तुलना में 2025 में प्रदूषण स्तर गिरने के पीछे कुछ प्राकृतिक और मानवीय कारक जिम्मेदार रहे:
- अत्यधिक बारिश: मई से अक्टूबर के बीच दिल्ली में औसत से ज्यादा बारिश हुई, जिसने धूल के कणों को जमने नहीं दिया।
- जल्दी दिवाली: इस साल दिवाली जल्दी आने के कारण आतिशबाजी का धुआं और सर्दियों के कोहरे का घातक मेल (Smog) लंबे समय तक नहीं खिंच पाया।
- पराली के मामलों में कमी: पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में पिछले वर्षों के मुकाबले गिरावट दर्ज की गई।
- तेज हवाएं: नवंबर और दिसंबर के कई दिनों में तेज हवाओं ने प्रदूषकों को शहर से बाहर धकेलने में मदद की।
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के कुछ खास इलाकों में प्रदूषण का स्तर अभी भी जानलेवा बना हुआ है। PM2.5 के मामले में ये तीन जगहें सबसे ऊपर रहीं:
- जहांगीरपुरी: 130 µg/m³
- वजीरपुर: 124 µg/m³
- आनंद विहार: 121 µg/m³
EnviroCatalysts के संस्थापक सुनील दहिया के अनुसार, प्रदूषण के स्तर में यह ‘ठहराव’ डराने वाला है। उन्होंने बताया कि भले ही औद्योगिक उत्पादन की प्रति यूनिट उत्सर्जन (Emission intensity) में सुधार हुआ हो, लेकिन आबादी और बढ़ती खपत ने उन फायदों को खत्म कर दिया है। दिल्ली की हवा में एमिशन लोड (Emission Load) शहर की सहने की क्षमता से कहीं ज्यादा बना हुआ है।
दिल्ली की हवा का 5 साल में सबसे ‘साफ’ होना एक सकारात्मक संकेत तो है, लेकिन जब तक हम WHO के मानकों के करीब नहीं पहुँचते, तब तक दिल्लीवासियों के फेफड़ों पर मंडराता खतरा कम नहीं होगा। सरकार को ग्रेप (GRAP) जैसे तात्कालिक उपायों के साथ-साथ लॉन्ग-टर्म क्लीन एयर पॉलिसी पर और अधिक सख्ती से काम करने की जरूरत है।
