न्यूज स्कूप : सनातन धर्म और प्राचीन भारतीय शास्त्रों में जीवन और मृत्यु से जुड़े कई महत्वपूर्ण नियम बताए गए हैं। इनमें से एक सबसे प्रमुख नियम यह है कि किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी निंदा या अपमान नहीं करना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि किसी के जाने के बाद लोग उनके अतीत की गलतियों या उनके द्वारा दिए गए कष्टों की चर्चा करते हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार ऐसा करना न केवल अनैतिक है, बल्कि आध्यात्मिक रूप से आपके लिए हानिकारक भी है।
ऋषियों और मुनियों का मानना है कि जब कोई व्यक्ति हमारे बीच नहीं रहता, तो वह अपना पक्ष रखने की स्थिति में नहीं होता। ऐसे में उसकी कमियां गिनाना कायरता और नकारात्मकता का प्रतीक है।
प्राचीन ग्रंथों में मृत व्यक्ति के सम्मान को लेकर बहुत ही स्पष्ट बातें कही गई हैं:
- मनुस्मृति का मत: मनुस्मृति के अनुसार, किसी की भी निंदा करना अपराध है, लेकिन किसी मृत व्यक्ति का मजाक उड़ाना या उसकी बुराई करना ‘घोर अपराध’ की श्रेणी में आता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि ऐसा करने वाले व्यक्ति को आध्यात्मिक पतन का सामना करना पड़ता है।
- भीष्म पितामह की सीख: महाभारत के शांति पर्व में जब युधिष्ठिर पितामह भीष्म से राजनीति और धर्म की शिक्षा ले रहे थे, तब पितामह ने विशेष रूप से कहा था कि मृत व्यक्ति का अपमान भूलकर भी नहीं करना चाहिए। मृत्यु के साथ ही व्यक्ति के सारे दोष समाप्त मान लेने चाहिए।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, भले ही कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से हमारे बीच न हो, लेकिन उनके प्रति हमारे विचार और भावनाएं एक कार्मिक लिंक (Karmic Link) के रूप में सक्रिय रहती हैं। यदि हम उनके प्रति घृणा पालते हैं या उनकी बुराई करते हैं, तो हमारा भावनात्मक संबंध उनसे जुड़ा रहता है। इससे हमारी अपनी ‘हीलिंग’ (स्वयं को बेहतर बनाने की शक्ति) बाधित होती है। उन्होंने अपने जीवन में क्या गलत किया, इसका हिसाब ‘इतिहास और समय’ करता है, हमें अपनी ऊर्जा उनके दोष गिनने में व्यर्थ नहीं करनी चाहिए।
मृत्यु के बाद किसी के बारे में आप जो बोलते हैं, वह उस व्यक्ति के बारे में कम और आपकी अपनी मानसिकता के बारे में ज्यादा बताता है। प्रत्येक इंसान में अच्छाई और बुराई दोनों होती है। मरने के बाद मात्र उसकी बुराइयों को याद करना एक ‘अधूरा सच’ है। शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के बाद इंसान सांसारिक मोह-माया और अपने पाप-पुण्य के बंधनों से ऊपर चला जाता है, इसलिए जीवित मनुष्यों को उन्हें केवल शांति और प्रार्थना के साथ विदा करना चाहिए।
सनातन धर्म हमें ‘क्षमा’ और ‘शांति’ का मार्ग दिखाता है। किसी मृत व्यक्ति की बुराई करना आपकी अपनी नकारात्मकता को बढ़ाता है। बेहतर यही है कि हम उनके द्वारा दी गई अच्छी यादों को संजोएं या फिर मौन रहकर उनके प्रति सम्मान व्यक्त करें।
