न्यूज स्कूप : देश की राजधानी का गौरव और भारतीय वास्तुकला का बेजोड़ नमूना अक्षरधाम मंदिर (Akshardham Temple) एक बार फिर वैश्विक स्तर पर चर्चा का केंद्र बना हुआ है। मंदिर परिसर में स्थापित भगवान स्वामीनारायण के किशोर स्वरूप ‘नीलकंठ वर्णी’ की एक चमकदार और गगनचुंबी प्रतिमा श्रद्धालुओं और पर्यटकों का मन मोह रही है। 108 फुट ऊंची यह ‘स्वामीनारायण तप प्रतिमा’ न केवल दिल्ली की स्काईलाइन में एक नया आध्यात्मिक आयाम जोड़ रही है, बल्कि सनातन संस्कृति के त्याग और तपस्या का संदेश भी दे रही है।
नीलकंठ वर्णी की यह विशालकाय प्रतिमा वर्तमान में अपने अंतिम चरणों में है।
- वर्तमान स्थिति: प्रतिमा के आधार (Base) निर्माण का कार्य युद्धस्तर पर चल रहा है। यद्यपि इसका आधिकारिक अनावरण अभी शेष है, लेकिन इसकी भव्यता दूर से ही लोगों को आकर्षित कर रही है।
- अभिषेक समारोह: मंदिर प्रबंधन और सूत्रों के अनुसार, मार्च 2026 तक इस भव्य प्रतिमा का अभिषेक और विशेष पूजा समारोह आयोजित किए जाने की संभावना है। इसके बाद यह आधिकारिक रूप से श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोल दी जाएगी।
अक्षरधाम में स्थापित इस प्रतिमा में युवा संत नीलकंठ वर्णी को एक पैर पर खड़े होकर, दोनों भुजाएं आकाश की ओर उठाए गहरी ध्यान मुद्रा में दिखाया गया है।
- मुक्तिनाथ का संदर्भ: यह मुद्रा नेपाल के मुक्तिनाथ में की गई उनकी उस कठिन साधना को दर्शाती है, जहाँ उन्होंने कड़ाके की ठंड में एक पैर पर खड़े होकर तपस्या की थी।
- किशोरावस्था की प्रेरणा: यह प्रतिमा भगवान स्वामीनारायण के उस स्वरूप को समर्पित है जब मात्र 11 साल की आयु में उन्होंने उत्तर प्रदेश के अयोध्या के पास स्थित अपना घर त्याग दिया था और सात वर्षों तक पूरे भारत की नंगे पैर यात्रा की थी।
दिल्ली का अक्षरधाम मंदिर पहले से ही अपनी नक्काशी और संस्कृति प्रदर्शनी के लिए दुनिया भर में मशहूर है। नई प्रतिमा के जुड़ने से यहाँ के आध्यात्मिक वातावरण में और वृद्धि होगी।
- सांस्कृतिक जुड़ाव: यह प्रतिमा युवा पीढ़ी को दृढ़ संकल्प और आंतरिक शक्ति का पाठ पढ़ाती है।
- वैश्विक समानता: ऐसी ही विशाल तप प्रतिमाएं गांधीनगर (गुजरात) और न्यू जर्सी (अमेरिका) के स्वामीनारायण मंदिरों में भी स्थापित हैं, जो दुनिया भर में फैले स्वामीनारायण सत्संग के एकता का प्रतीक हैं।
- पर्यटन को बढ़ावा: 108 फुट की यह प्रतिमा दिल्ली आने वाले पर्यटकों के लिए एक प्रमुख ‘लैंडमार्क’ बनेगी।
गोंडा जिले के छपैया गांव में जन्मे घनश्याम पांडे (भगवान स्वामीनारायण) ने बचपन में ही वेदों और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। नीलकंठ वर्णी के रूप में उन्होंने हजारों मील की यात्रा की, समाज में व्याप्त कुरीतियों को दूर किया और करुणा, अहिंसा व भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया। उनकी यह यात्रा हिमालय की कंदराओं से लेकर दक्षिण के समुद्र तटों तक फैली हुई थी।
अक्षरधाम में नीलकंठ वर्णी की यह 108 फुट ऊंची प्रतिमा केवल एक संरचना नहीं, बल्कि उस अदम्य साहस और आध्यात्मिक खोज की याद दिलाती है जो भारत की मिट्टी की विशेषता है। मार्च 2026 में इसके अनावरण के साथ ही दिल्ली के आध्यात्मिक पर्यटन में एक नया स्वर्णिम अध्याय जुड़ जाएगा।
