न्यूज स्कूप : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार, 17 जनवरी 2026 को संघ के शताब्दी वर्ष समारोह के उपलक्ष्य में आयोजित एक कार्यक्रम में युवा उद्यमियों से संवाद किया। इस विशेष सत्र के दौरान उन्होंने आधुनिक युग की सबसे बड़ी आवश्यकता ‘टेक्नोलॉजी’ (Technology) और भारतीय अवधारणा ‘स्वदेशी’ के बीच संतुलन बनाने पर विस्तार से चर्चा की।
मोहन भागवत ने स्पष्ट संदेश दिया कि प्रगति के लिए तकनीक अनिवार्य है, लेकिन मानवता को मशीन का दास नहीं बनना चाहिए। उन्होंने उद्यमियों से आह्वान किया कि वे व्यापार को केवल मुनाफे का जरिया न मानकर समाज कल्याण का माध्यम बनाएं।
संघ प्रमुख ने तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर सचेत करते हुए कहा कि हमें यह तय करना होगा कि कौन किसे नियंत्रित कर रहा है।
- गुलामी से बचें: मोहन भागवत ने कहा, “टेक्नोलॉजी आज के समय में अपरिहार्य (Inescapable) है और इसमें कोई बुराई नहीं है। मगर हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम इस हद तक इस पर निर्भर न हो जाएं कि यह हमें नियंत्रित करने लगे। मनुष्य को तकनीक का गुलाम नहीं, बल्कि उसका स्वामी बने रहना चाहिए।”
- स्वदेशी का सही अर्थ: उन्होंने ‘स्वदेशी’ की व्याख्या करते हुए कहा कि स्वदेशी अपनाने का मतलब पुरानी पद्धति पर अटके रहना या आधुनिक तकनीक को नकारना नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है तकनीक को अपनी शर्तों और अपनी जरूरतों के हिसाब से ढालना।
व्यवसाय और जिम्मेदारी के तालमेल को समझाने के लिए मोहन भागवत ने भारतीय किसानों का उदाहरण दिया।
- पेशा नहीं, कर्तव्य: उन्होंने कहा कि भारत का किसान खेती को महज एक आजीविका कमाने का जरिया या पेशा नहीं मानता, बल्कि वह इसे अपना ‘कर्तव्य’ समझता है।
- दुर्लभ विचार: भागवत के अनुसार, “यह एक ऐसा नेक और सात्विक विचार है, जो दुनिया के किसी अन्य कोने में शायद ही देखने को मिले।” उन्होंने उद्यमियों को सलाह दी कि उनके स्टार्टअप्स और बिजनेस का मॉडल भी इसी तरह समाज-केंद्रित होना चाहिए।
आधुनिक तकनीक और ऑटोमेशन के दौर में रोजगार की सुरक्षा पर संघ प्रमुख ने विशेष जोर दिया।
- अनुकूलन की आवश्यकता: उन्होंने कहा कि आधुनिक टेक्नोलॉजी को देश की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों के अनुकूल बनाया जाना चाहिए। तकनीक ऐसी न हो जो भारत की विशाल जनसंख्या के लिए बेरोजगारी का कारण बने।
- रोजगार बचाना प्राथमिकता: उन्होंने उद्यमियों से अपील की कि वे ऐसी तकनीक विकसित करें जो समाज को नुकसान न पहुँचाए और जिससे रोजगार के अवसर कम न हों। विकास वही सार्थक है जो अंतिम व्यक्ति को काम और सम्मान दे सके।
मोहन भागवत का यह संबोधन संघ के शताब्दी वर्ष के उस विजन को दर्शाता है जिसमें भारत को आधुनिक तो बनाना है, लेकिन उसकी सांस्कृतिक और मानवीय जड़ों को बचाए रखते हुए। उनका यह संदेश स्टार्टअप इंडिया और डिजिटल इंडिया के दौर में नैतिकता और सामाजिक सुरक्षा के प्रति एक महत्वपूर्ण चेतावनी और मार्गदर्शन है।
