न्यूज स्कूप : बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के बीच मयमनसिंह जिले से एक हृदयविदारक घटना सामने आई है। यहां एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने वाले हिंदू युवक दीपू चंद्र दास को कट्टरपंथियों की उग्र भीड़ ने ‘मजहबी भावना को ठेस पहुंचाने’ के झूठे आरोप में बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। अब इस मामले में पुलिस (RAB-14) और फैक्ट्री प्रबंधन के बयानों ने इस हत्याकांड की क्रूरता और लापरवाही की परतों को खोल दिया है।
मयमनसिंह में RAB-14 के कंपनी कमांडर मोहम्मद शम्सुज्जमां ने ‘द डेली स्टार’ को दिए बयान में चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने बताया कि जांच में ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे साबित हो कि दीपू ने सोशल मीडिया या किसी अन्य माध्यम से मजहबी भावनाओं को आहत किया था।
शम्सुज्जमां ने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, “जब हालात बेकाबू हो गए, तो फैक्ट्री की संपत्ति और इमारत को उग्र भीड़ से बचाने के लिए दीपू को जबरदस्ती फैक्ट्री से बाहर निकाल दिया गया।” यानी पुलिस का मानना है कि फैक्ट्री को नुकसान से बचाने के लिए एक मासूम की बलि दे दी गई।
वहीं, पॉयनियर निटवेयर बांग्लादेश के सीनियर मैनेजर साकिब महमूद ने पुलिस के आरोपों को सिरे से नकार दिया है। उन्होंने बताया कि शाम 5 बजे हंगामा शुरू हुआ और उन्होंने स्थिति संभालने की कोशिश की।
- फर्जी इस्तीफा: शाम 7:30 बजे दीपू से एक ‘नकली इस्तीफा’ भी लिखवाया गया ताकि भीड़ शांत हो जाए।
- देरी का कारण: जब प्रबंधन से पूछा गया कि पुलिस को सूचना देने में 3 घंटे की देरी क्यों हुई, तो उन्होंने कहा कि वे आंतरिक रूप से मामले को सुलझाने की कोशिश कर रहे थे।
- भीड़ का हमला: रात पौने नौ बजे भीड़ ने फैक्ट्री का दरवाजा तोड़ दिया और सिक्योरिटी रूम में छिपे दीपू को खींचकर बाहर ले गए।
18 दिसंबर 2025 की रात को हुई यह घटना इंसानियत को शर्मसार करने वाली है। भीड़ ने दीपू को फैक्ट्री से 2 किलोमीटर दूर हाईवे तक घसीटा, उसे पीट-पीटकर मार डाला और फिर उसकी लाश को पेड़ से लटकाकर आग लगा दी। इस दौरान लगभग 10 किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम लगा रहा, जिससे पुलिस समय पर मौके तक नहीं पहुंच सकी। एसपी मोहम्मद फरहाद हुसैन खान का कहना है कि अगर उन्हें समय पर सूचना दी जाती, तो दीपू की जान बचाई जा सकती थी।
दीपू चंद्र दास की हत्या के मामले में बांग्लादेश पुलिस ने अब तक 12 लोगों को गिरफ्तार किया है। मृतक के भाई अपू चंद्र दास ने भालुका पुलिस स्टेशन में 140-150 अज्ञात लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई है। यह घटना एक बार फिर बांग्लादेश में मानवाधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर बड़े सवाल खड़े करती है।
