20 Feb 2026, Fri
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लाल किले के प्रांगण में छत्तीसगढ़ के ‘गेड़ी नृत्य’ कलाकारों ने बांधा समां; UNESCO-संस्कृति मंत्रालय के अंतर्राष्ट्रीय समारोह में 180 देशों के प्रतिनिधियों ने सराहा

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न्यूज स्कूप : देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले के प्रांगण में 7 से 13 दिसंबर तक आयोजित अंतर्राष्ट्रीय समारोह में छत्तीसगढ़ की लोक कला और संस्कृति का डंका बजा। इस भव्य समारोह में 180 देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया, जहां छत्तीसगढ़ के गेड़ी नृत्य कलाकारों ने अपनी मोहक प्रस्तुति से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

बिलासपुर जिले की सांस्कृतिक संस्था लोक श्रृंगार भारती के गेड़ी लोक नृत्य दल की प्रस्तुति को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खूब सराहा गया है। इस उपलब्धि पर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने नर्तक दल को बधाई और शुभकामनाएं दी हैं।

केंद्रीय मंत्रियों ने की प्रशंसा

गेड़ी लोक नृत्य दल के कलाकारों की प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली थी कि केंद्र सरकार के मंत्री भी इससे अत्यंत प्रभावित हुए।

  • केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने प्रस्तुति देखकर कलाकारों की प्रशंसा की और उन्हें ‘छत्तीसगढ़िया सबले बढ़िया’ का नारा दिया।
  • कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर भी उपस्थित थे।

UNESCO और संस्कृति मंत्रालय का सहयोग

यह अंतर्राष्ट्रीय समारोह अपने आप में ऐतिहासिक था, जिसे सांस्कृतिक संगठन (UNESCO) और संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के आमंत्रण पर आयोजित किया गया था। इस समारोह का ऐतिहासिक क्षण तब आया, जब इस दौरान दीपावली को यूनेस्को द्वारा विश्व सांस्कृतिक धरोहर के रूप में मान्यता दी गई।

गेड़ी नृत्य से विदेशी दर्शकों का दिल जीता

मुख्य गायक एवं नृत्य निर्देशक अनिल गढ़ेवाल के कुशल नेतृत्व में गेड़ी नृत्य दल ने अपने रोमांचक प्रदर्शन से अंतर्राष्ट्रीय दर्शकों को रोमांचित कर दिया।

  • मुख्य प्रस्तुति: मुख्य गायक अनिल गढ़ेवाल द्वारा प्रस्तुत ‘काट ले हरियर बांसे’ गीत ने विदेशी प्रतिनिधियों के मन में छत्तीसगढ़ी संस्कृति के प्रति गहरी जिज्ञासा उत्पन्न की।
  • साहसिक करतब: गेड़ी नर्तकों में प्रभात बंजारे, सूरज खांडे, शुभम भार्गव, लक्ष्मी नारायण माण्डले, फूलचंद ओगरे और मनोज माण्डले ने ऊँची गेड़ी पर संतुलन बनाते हुए मानवीय संरचनाएं (Human Pyramids) बनाईं, जिससे पूरा प्रांगण तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
  • संगीत: मुख्य मांदल वादक मोहन डोंगरे ने एक ही स्थान पर घूमते हुए मांदल वादन किया, जबकि हारमोनियम वादक सौखी लाल कोसले एवं बांसुरी वादक महेश नवरंग की स्वर लहरियों पर विभिन्न देशों से आए प्रतिनिधि झूम उठे।

इस आयोजन से छत्तीसगढ़ की अनूठी कला संस्कृति को वैश्विक पहचान मिली है।

By News Scoop Desk

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