न्यूज स्कूप : दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अपराध जगत पर एक और बड़ी चोट करते हुए मोस्ट वांटेड अपराधी महफूज उर्फ ‘बॉबी कबूतर’ को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है। हाशिम बाबा और लॉरेंस बिश्नोई सिंडिकेट से जुड़ा यह गैंगस्टर लंबे समय से पुलिस की रडार पर था। बॉबी कबूतर की गिरफ्तारी केवल एक सफलता नहीं है, बल्कि यह उन अनसुलझे अपराधों की कड़ियों को जोड़ने वाला एक अहम मोड़ भी है।
महफूज उर्फ बॉबी कबूतर का नाम बॉलीवुड अभिनेत्री दिशा पाटनी के बरेली स्थित घर पर हुई फायरिंग और मशहूर पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला की हत्या से पहले उनके घर की रेकी करने के मामले में वांटेड था। लेकिन इस गिरफ्तारी ने एक बार फिर उस सवाल को जन्म दे दिया है कि आखिर अपराध की दुनिया में असली नाम से ज्यादा ‘बॉबी कबूतर’ जैसे उपनाम (Alias) क्यों मशहूर हो जाते हैं?
अपराध की दुनिया में उपनाम केवल एक पुकारने वाला नाम नहीं, बल्कि एक ‘ब्रांड’ की तरह काम करता है। कई बार ये नाम इतने प्रभावशाली हो जाते हैं कि पुलिस रिकॉर्ड और मीडिया हेडलाइंस में असली नाम पीछे छूट जाता है। अपराधियों के लिए ये नाम डर पैदा करने और अपनी एक अलग छवि बनाने का जरिया होते हैं।
नामों के पीछे का तर्क:
- विशेषता: यदि कोई अपराधी बहुत फुर्तीला है और वारदात के बाद गायब हो जाता है, तो उसे ‘कबूतर’ जैसा नाम मिल सकता है।
- मनोवैज्ञानिक हथियार: ‘सुल्तान’, ‘कालिया’ या ‘बाबा’ जैसे नाम दबदबा और नेतृत्व दिखाने के लिए इस्तेमाल होते हैं।
- चालाकी: असली नाम छिपाने के लिए अक्सर अपराधी उपनामों का सहारा लेते हैं, जिससे पुलिस की फाइलों में वे एक पहेली बने रहते हैं।
अपराध जगत का इतिहास ऐसे कई नामों से भरा पड़ा है जिनके पीछे दिलचस्प कहानियां हैं:
| उपनाम | असली नाम | नाम पड़ने का कारण |
| मुन्ना बजरंगी | प्रेम प्रकाश सिंह | बचपन का नाम ‘मुन्ना’ और हनुमान भक्ति के कारण ‘बजरंगी’ जुड़ा। |
| छोटा राजन | राजेंद्र निकालजे | ‘बड़ा राजन’ का दाहिना हाथ होने के कारण यह नाम मिला। |
| सईद अलंगा | सईद | पत्थरों (अलंगा) से हमला करने की आदत की वजह से। |
| फहीम बम | फहीम खान | बम बनाने में महारत और हमेशा विस्फोटक के साथ पकड़े जाने पर। |
| मजहर टोपी | मजहर | जुए में हारने के बाद लोगों को चतुराई से ‘टोपी पहनाने’ (धोखा देने) के कारण। |
| डैडी | अरुण गवली | मराठी शब्द ‘दादा’ (बड़ा भाई) से निकला, जो उनके दबदबे को दिखाता था। |
| टिल्लू ताजपुरिया | सुनील राठी | बचपन का नाम टिल्लू और गांव ‘ताजपुर’ की पहचान। |
महफूज उर्फ बॉबी कबूतर की गिरफ्तारी सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड के लगभग चार साल बाद हुई है। पुलिस के अनुसार, वह लॉरेंस बिश्नोई और हाशिम बाबा गिरोह के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम कर रहा था। उसकी गिरफ्तारी से उत्तर भारत में सक्रिय बिश्नोई सिंडिकेट के कई छिपे हुए गुर्गों और उनके भविष्य के प्लान्स का खुलासा होने की उम्मीद है।
पूर्वी दिल्ली (यमुनापार) में हाशिम बाबा का गहरा प्रभाव है, जहाँ वह खुद को ‘बाबा’ यानी रक्षक और मार्गदर्शक के रूप में पेश करता था। बॉबी कबूतर उसी गिरोह का शार्पशूटर था, जिसका नाम सुनते ही बरेली से लेकर मानसा तक खौफ पैदा होता था।
बॉबी कबूतर की गिरफ्तारी यह साबित करती है कि अपराधी अपनी पहचान बदलने के लिए चाहे कितने भी ‘उपनाम’ रख लें या खुद को कितना भी छुपा लें, कानून के लंबे हाथ उन तक पहुंच ही जाते हैं। अपराध की दुनिया में ब्रांडिंग भले ही कुछ समय के लिए डर पैदा कर दे, लेकिन अंत हमेशा सलाखों के पीछे ही होता है।
