20 Feb 2026, Fri
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न्यूज स्कूप : हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। माघ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे ‘जया एकादशी’ (Jaya Ekadashi) के नाम से जाना जाता है, आत्मशुद्धि और पापों के शमन के लिए विशेष प्रसिद्ध है। साल 2026 में तिथियों के गणित को लेकर भक्तों में संशय है कि व्रत 28 जनवरी को रखा जाए या 29 जनवरी को।

शास्त्रों और पंचांग की गणना के अनुसार, इस वर्ष यह व्रत 29 जनवरी 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। गुरुवार का दिन भगवान विष्णु को ही समर्पित होता है, ऐसे में इस दिन एकादशी का होना एक दुर्लभ और अत्यंत शुभ संयोग बना रहा है।

28 या 29 जनवरी? शास्त्र सम्मत तिथि

पंचांग के अनुसार, जब एकादशी तिथि दो दिनों में स्पर्श करती है, तो ‘उदया तिथि’ और ‘द्वादशी युक्त एकादशी’ को ही प्राथमिकता दी जाती है।

  • 29 जनवरी का महत्व: इस दिन सूर्योदय के समय एकादशी तिथि विद्यमान रहेगी। वैष्णव मत और शास्त्रों के अनुसार, सूर्योदय काल की तिथि में व्रत रखना ही फलदायी होता है। इसलिए 29 जनवरी को व्रत रखना ही शास्त्रसम्मत है।

जया एकादशी पूजन विधि (Puja Vidhi)

इस शुभ संयोग का पूरा लाभ उठाने के लिए भगवान विष्णु की आराधना इस प्रकार करें:

  1. ब्रह्म मुहूर्त में जागें: सूर्योदय से पूर्व उठकर भगवान का ध्यान करें और स्नान के जल में थोड़ा गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
  2. पीले वस्त्र: भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए स्वयं पीले वस्त्र धारण करें।
  3. संकल्प: हाथ में जल और तिल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  4. पंचामृत अभिषेक: लड्डू गोपाल या भगवान विष्णु की प्रतिमा का दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें।
  5. तुलसी दल: भगवान को पीले फूल, पीला चंदन और तुलसी दल अर्पित करें। याद रहे, बिना तुलसी के श्रीहरि भोग स्वीकार नहीं करते।
  6. दीप दान: शाम को घी का दीपक जलाकर विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।

जया एकादशी के अद्भुत लाभ

लाभ का प्रकारविवरण
पापों का नाशजाने-अनजाने में हुए शारीरिक और मानसिक पापों से मुक्ति मिलती है।
पितृ शांतिइस व्रत का पुण्य फल पितरों को अर्पित करने से उनका उद्धार होता है।
मानसिक शांतिउपवास से इंद्रियों पर नियंत्रण बढ़ता है और नकारात्मकता दूर होती है।
मोक्ष प्राप्तिमान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है।

पौराणिक कथा और महत्व

जया एकादशी के महत्व की जड़ें एक पौराणिक कथा में छिपी हैं। कथा के अनुसार, इंद्र की सभा के गायक माल्यवान और नर्तकी पुष्पवती को एक श्राप के कारण पिशाच योनि में जाना पड़ा था। उन्हें हिमालय पर अत्यंत कष्ट सहने पड़े।

संयोगवश, माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन उन्होंने न कुछ खाया और न ही सोए, यानी अनजाने में ही उनसे जया एकादशी का व्रत हो गया। इस व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु प्रसन्न हुए और उन्हें पिशाच योनि से मुक्त कर पुनः दिव्य रूप प्रदान किया। यही कारण है कि मान्यता है कि जो व्यक्ति यह व्रत करता है, उसे मृत्यु के बाद कभी प्रेत योनि में नहीं भटकना पड़ता।

जया एकादशी केवल एक उपवास नहीं, बल्कि जीवन की बाधाओं को दूर करने और भगवान की कृपा प्राप्त करने का दिव्य मार्ग है। 29 जनवरी को गुरुवार का दिन होने से यह अवसर और भी खास है, इसका लाभ अवश्य उठाएं।

By News Scoop Desk

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