20 Feb 2026, Fri
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न्यूज स्कूप : बांग्लादेश की राजनीति में दशकों तक अपनी धाक जमाने वाली पहली महिला प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) की अध्यक्ष खालिदा जिया (Khaleda Zia) का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया। मंगलवार (30 दिसंबर, 2025) को उनकी पार्टी बीएनपी ने इस दुखद खबर की पुष्टि की। वह 80 वर्ष की थीं और लंबे समय से लीवर सिरोसिस, मधुमेह, गठिया और हृदय रोगों जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं।

खालिदा जिया का निधन न केवल बांग्लादेश बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की राजनीति के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उनके निधन के साथ ही बांग्लादेशी सियासत के उस युग का अंत हो गया है, जिसे दुनिया ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ के नाम से जानती थी।

दो बार संभाली देश की सत्ता

खालिदा जिया ने दो बार बांग्लादेश के प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया:

  1. पहला कार्यकाल (1991-1996): 1990 में सैन्य शासन की समाप्ति के बाद हुए पहले लोकतांत्रिक चुनावों में जीत हासिल कर वह देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।
  2. दूसरा कार्यकाल (2001-2006): उन्होंने दोबारा भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की।

उनके पति, जियाउर रहमान, बांग्लादेश के पूर्व राष्ट्रपति और बीएनपी के संस्थापक थे, जिनकी 1981 में हत्या कर दी गई थी। पति की मृत्यु के बाद ही खालिदा ने राजनीति में कदम रखा और बिखरी हुई पार्टी को एकजुट कर सत्ता के शिखर तक पहुँचाया।

‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का दौर

बांग्लादेश की राजनीति पिछले तीन दशकों से दो शक्तिशाली महिलाओं— शेख हसीना (अवामी लीग) और खालिदा जिया (BNP) के इर्द-गिर्द सिमटी रही।

  • सहयोग से संघर्ष तक: 1980 के दशक में दोनों ने मिलकर सैन्य तानाशाह इरशाद के खिलाफ आंदोलन किया था। लेकिन 1991 में लोकतंत्र की बहाली के बाद दोनों घोर विरोधी बन गईं।
  • सत्ता का अदल-बदल: 1990 से लेकर 2024 तक बांग्लादेश की सत्ता या तो हसीना के हाथ में रही या खालिदा के। मीडिया ने उनके इस वर्चस्व की लड़ाई को ‘बैटल ऑफ बेगम्स’ का नाम दिया।

राजनीतिक उतार-चढ़ाव और अंतिम समय

खालिदा जिया का अंतिम दशक काफी संघर्षपूर्ण रहा। भ्रष्टाचार के आरोपों में उन्हें जेल जाना पड़ा, जिससे उनकी सेहत गिरती चली गई।

  • रिहाई: अगस्त 2024 में बांग्लादेश में हुए बड़े राजनीतिक उथल-पुथल के बाद उन्हें जेल से रिहा किया गया था।
  • इलाज: रिहाई के बाद वह इलाज के लिए लंदन गई थीं और मई 2025 में ही स्वदेश लौटी थीं।

उनके बड़े बेटे तारीक रहमान, जो लंबे समय से लंदन में निर्वासित जीवन बिता रहे थे, इसी महीने अपनी मां के अंतिम समय में साथ रहने के लिए बांग्लादेश लौटे थे।

एक सैनिक की पत्नी से ‘देशनेत्री’ बनने का सफर

  • 1945 में जन्मी खालिदा का राजनीति से कोई पुराना नाता नहीं था। 1960 में उनकी शादी एक सैनिक अधिकारी जियाउर रहमान से हुई। 1971 की आजादी की लड़ाई में जियाउर रहमान एक नायक बनकर उभरे। 1981 में उनकी हत्या के बाद जब पार्टी टूटने लगी, तब 1984 में कार्यकर्ताओं के आग्रह पर ‘घरेलू महिला’ खालिदा जिया ने पार्टी की बागडोर संभाली और ‘देशनेत्री’ (Nation’s Leader) कहलाईं।

खालिदा जिया का जाना बांग्लादेश के लिए एक भावुक क्षण है। उनके समर्थकों के लिए वह लोकतंत्र की रक्षक थीं, तो विरोधियों के लिए एक सख्त प्रतिद्वंद्वी। उनका जाना बांग्लादेशी राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा कर गया है, जिसे भरना मुश्किल होगा।

By News Scoop Desk

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