न्यूज स्कूप : जगत के पालनहार भगवान विष्णु ने द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया था और अपनी कई लीलाओं से धर्म और मानवता को बचाया। द्वापर युग को श्रीकृष्ण का युग कहा जाता है। अपने इस युग में उन्होंने मानवता को नष्ट कर देने वाले महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी बनकर धर्म की स्थापना की थी, जिसमें पांडवों को विजय हासिल हुई।
पांडवों ने युद्ध जीत तो लिया था, लेकिन इस भीषण तबाही को देखकर उनका मन विचलित था। युद्ध के बाद श्रीकृष्ण जब पांडवों के साथ गांधारी और धृतराष्ट्र के पास दुर्योधन की मौत पर शोक जाहिर करने और क्षमा मांगने पहुंचे, तो दुर्योधन की मृत्यु की बात सुनकर गांधारी का दिल दुख और क्रोध से भर गया। उन्होंने पांडवों को छोड़, श्रीकृष्ण को इस विनाश का मुख्य जिम्मेदार माना।
क्रोधित गांधारी ने श्रीकृष्ण से कहा कि, “आप तो विष्णु अवतार हैं और आप चाहते तो यह युद्ध कभी होता ही नहीं। फिर भी आपने इसे होने दिया।” इसके बाद गांधारी ने श्रीकृष्ण को श्राप देते हुए कहा कि, “आज से ठीक 36 सालों के बाद तुम भी इस धरती को छोड़कर चले जाओगे और तुम्हारे यदुवंश का पूरी तरह से नाश हो जाएगा।” कहा जाता है कि गांधारी का यही श्राप श्रीकृष्ण के देह त्याग और यदुवंश के नाश का सबसे बड़ा कारण बना।
कुछ साल बाद, श्राप की घटना को बल देने वाली एक और घटना घटी। श्रीकृष्ण का पुत्र सांबा ने गर्भवती स्त्री का वेष बनाया और कुछ ऋषि-मुनियों से मिलने गए। सांबा का यह मजाक ऋषियों को क्रोधित कर गया और उन्होंने श्राप दे दिया कि, “तुम एक ऐसे लोहे के तीर को जन्म दोगे जो तुम्हारे कुल-साम्राज्य का नाश कर देगा।”
यह सुनकर सांबा भयभीत हो गए। उन्होंने यह बात उग्रसेन को बताई। उग्रसेन ने सांबा को उस तीर का चूर्ण बनाकर नदी में बहा देने की सलाह दी, ताकि वह श्राप से मुक्त हो जाएं।
जिस इलाके में इस लोहे के चूर्ण को जमा किया गया था, वहाँ एक विशेष तरह की घास उग आई। इसके बाद द्वारका में कुछ बेहद अशुभ संकेत देखे जाने लगे जैसे सुदर्शन चक्र, श्रीकृष्ण का शंख, उनका रथ और बलराम का हल अदृश्य हो गए। द्वारका में अपराध और पाप बढ़ गया। यह देखकर श्रीकृष्ण अत्यंत चिंतित हुए और उन्होंने प्रजा से कहा कि वे प्रभास नदी के तट पर जाकर अपने पापों का प्रायश्चित करें।
वहाँ जाकर, द्वारिका के लोग नशे में धुत होकर आपस में लड़ने लगे। गांधारी के श्राप के अनुसार, आपसी कलह के कारण यदुवंश का पूरी तरह से नाश हो गया।
यदुवंश के नाश की घटना के कुछ समय बाद, श्रीकृष्ण प्रभास नदी के तट पर एक पेड़ के नीचे योग समाधि की मुद्रा में विश्राम कर रहे थे।
इसी दौरान जरा नाम के एक शिकारी ने दूर से श्रीकृष्ण के हिलते हुए पैरों को हिरण समझकर उस पर तीर चला दिया। वह लोहे का तीर सीधा श्रीकृष्ण के पैर के तलवे में लगा। पौराणिक कथाओं के अनुसार, वह लोहे का तीर वही था जिसे सांबा ने चूर्ण बनाकर नदी में बहाया था, और जो घास के रूप में उग आया था।
शिकारी जरा को जब अपनी गलती का एहसास हुआ, तो उसने क्षमा मांगी। उसी तीर के लगने से, भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण ने द्वापर युग में अपनी लीला समाप्त की और देह त्याग कर परमधाम लौट गए।
