न्यूज स्कूप : एक फिल्म को बनाने के पीछे न सिर्फ एक बड़ी टीम का हाथ होता है, बल्कि सालों की मेहनत होती है. अक्सर समय पर ही फिल्म का प्रोडक्शन खत्म हो जाता है, पर भारतीय सिनेमा इतिहास में ऐसी कई फिल्में हैं, जिनका काम तो वक्त पर शुरू हुआ था, पर उन्हें पूरा करने में मेकर्स के पसीने छूट गए. आज हम आपको इंडियन सिनेमा हिस्ट्री की उस फिल्म के बारे में बताएंगे, जिसे बनाने में 10-20 साल नहीं, बल्कि पूरे 23 साल लग गए थे.
यह एक ऐसी फिल्म है जिसे ‘शापित’ भी कहा गया, क्योंकि इसके निर्माण के दौरान उन दोनों हीरोज की जान चली गई जिन्होंने इसे शुरू किया और खत्म किया. यहाँ बात हो रही है महान निर्देशक के. आसिफ की फिल्म ‘लव एंड गॉड’ (Love And God) की.
महान फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ बनाने वाले के. आसिफ ने साल 1963 में अपनी एकमात्र पूरी तरह रंगीन (Color) फिल्म ‘लव एंड गॉड’ पर काम शुरू किया था. इस फिल्म के जरिए वे लैला-मजनू की अमर प्रेम कहानी को बड़े पर्दे पर उतारना चाहते थे.
- शुरुआती कास्ट: फिल्म के लिए गुरु दत्त को ‘कैस’ (मजनू) और निम्मी को ‘लैला’ के किरदार के लिए चुना गया था.
- पहली त्रासदी: फिल्म की कुछ शूटिंग पूरी हो चुकी थी, लेकिन साल 1964 में गुरु दत्त की अचानक और रहस्यमयी मौत ने पूरे प्रोजेक्ट को अधर में लटका दिया. फिल्म का काम रोक दिया गया.
गुरु दत्त की मौत के कुछ सालों बाद, के. आसिफ ने फिल्म को दोबारा शुरू करने का फैसला किया. इस बार उन्होंने ‘कैस’ के रोल के लिए दमदार अभिनेता संजीव कुमार को चुना. साल 1970 में फिल्म की शूटिंग फिर से शुरू हुई.
- निर्देशक की मौत: अभी फिल्म पूरी भी नहीं हुई थी कि 9 मार्च 1971 को खुद निर्देशक के. आसिफ का निधन हो गया.
- अधूरी फिल्म: उस समय तक फिल्म का क्लाइमैक्स शूट नहीं हो पाया था, जिसके कारण फिल्म एक बार फिर डिब्बे में बंद हो गई. ऐसा लगने लगा था कि अब यह फिल्म कभी रिलीज नहीं हो पाएगी.
| वर्ष | घटनाक्रम |
| 1963 | फिल्म का निर्माण शुरू (गुरु दत्त के साथ) |
| 1964 | गुरु दत्त का निधन, शूटिंग रुकी |
| 1970 | संजीव कुमार के साथ दोबारा शूटिंग शुरू |
| 1971 | डायरेक्टर के. आसिफ का निधन, फिल्म अटकी |
| 1986 | 23 साल बाद फिल्म आखिरकार रिलीज हुई |
के. आसिफ की मौत के करीब 15 साल बाद, उनकी पत्नी अख्तर आसिफ ने अपने पति के इस अधूरे सपने को पूरा करने का बीड़ा उठाया. उन्होंने मशहूर प्रोड्यूसर के. सी. बोकाडिया की मदद ली.
- टुकड़ों में जमा की फिल्म: अख्तर आसिफ तीन अलग-अलग स्टूडियो में गईं और फिल्म के बिखरे हुए हिस्सों को इकट्ठा किया.
- तीसरी त्रासदी: विडंबना देखिए कि जब 1986 में फिल्म रिलीज के लिए तैयार हुई, तब तक इसके दूसरे हीरो संजीव कुमार का भी निधन (1985) हो चुका था.
‘लव एंड गॉड’ केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के संघर्ष और जुनून की दास्तां है. भले ही यह बॉक्स ऑफिस पर सफल न रही हो, लेकिन इसे के. आसिफ की भव्यता और एक अटूट वादे के लिए हमेशा याद रखा जाएगा.
