न्यूज स्कूप : भारत में कई प्राचीन और रहस्यमयी तीर्थ स्थल मौजूद हैं, लेकिन गुजरात के भावनगर के पास समुद्र तट पर स्थित निष्कलंक महादेव मंदिर अपनी अद्भुत खगोलीय स्थिति के कारण देशभर में प्रसिद्ध है। इस पवित्र स्थान को शैव परंपरा में ‘गुप्त तीर्थ’ के नाम से जाना जाता है।
माना जाता है कि पूरे भारत में कुल 5 गुप्त तीर्थ बताए गए हैं, जिनमें से 3 प्रकट हैं—जैसे रूपेश्वर महादेव, श्री स्तंभेश्वर महादेव, और निष्कलंक महादेव। निष्कलंक महादेव मंदिर के शिवलिंग हजारों सालों से अद्भुत, अविश्वसनीय और अकल्पनीय रहस्यों के साक्षी रहे हैं।
निष्कलंक महादेव मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह समुद्र के बीच में बना हुआ है और दिन के 24 घंटों में से करीब 14 घंटे ये शिवलिंग समुद्र की गहराइयों में समा जाते हैं। यह अद्भुत दृश्य ज्वार-भाटे (Tides) के कारण होता है।
- दर्शन का समय: भक्तों को इन शिवलिंगों के दर्शन तभी हो पाते हैं जब समुद्र का जलस्तर कम होता है। जलस्तर घटने पर भक्त लगभग आधा किलोमीटर तक पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचते हैं और पूजा करते हैं।
- अदृश्य मंदिर: जब जलस्तर बढ़ता है, तब मंदिर पूरी तरह से डूब जाता है, और बाहर केवल मंदिर की ध्वज पताका (झंडा) रह जाती है।
- पांच शिवलिंग: इस मंदिर में एक पत्थर की चौकोर चौकी पर पांच शिवलिंग स्थित हैं, जो एक साथ पांडवों का प्रतिनिधित्व करते हैं। हर शिवलिंग के साथ यहां नन्दी महाराज भी मौजूद हैं। मान्यताओं के अनुसार, ये पांचों शिवलिंग लगभग 5000 साल से यहीं स्थित हैं।
निष्कलंक महादेव का इतिहास सीधे तौर पर महाभारत काल से जुड़ा हुआ है।
- पाप मुक्ति की तपस्या: महाभारत का युद्ध समाप्त होने के बाद, पांडव इस बात से बड़े दुखी थे कि उन्हें अपने ही सगे-सम्बन्धियों की हत्या का पाप लगा है। भगवान श्रीकृष्ण के कहे अनुसार, पांडव वर्तमान गुजरात में स्थित कोलियाक तट पर पहुंचे।
- शिव का लिंग रूप: पांडवों ने यहाँ भगवान शिव का ध्यान करते हुए कठिन तपस्या शुरू की। भगवान भोलेनाथ उनकी तपस्या से खुश हुए और पांचों भाइयों को पाप से मुक्ति देने के लिए लिंग रूप में अलग-अलग दर्शन दिए। पांडवों ने इन शिवलिंगों को वहीं स्थापित कर दिया और इसे ‘निष्कलंक’ (दोष रहित) नाम दिया गया।
माना जाता है कि यह मंदिर कभी समुद्र की लहरों में अंदर ही गुप्त रूप से विराजमान था और कई सदियों के बीतने के बाद प्रकट हुआ।
निष्कलंक महादेव मंदिर में हर वर्ष भाद्रपद महीने की अमावस्या पर एक विशाल मेला लगता है, जिसे भाद्रवी मेला कहा जाता है।
अखंड पताका: भाद्रवी मेला मंदिर की पताका फहराने से शुरू होता है। यही पताका मंदिर पर अगले एक साल तक फहराती रहती है। यह एक बड़ा आश्चर्य है कि साल भर एक ही पताका लगे रहने और समुद्र की तेज लहरों का सामना करने के बावजूद कभी भी इस पताका को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।
अमावस्या पर विशेष भीड़: प्रत्येक अमावस्या के दिन इस मंदिर में भक्तों की विशेष भीड़ रहती है। लोगों की ऐसी मान्यता है कि यदि किसी प्रियजन की चिता की राख शिवलिंग पर लगाकर जल में प्रवाहित कर दें, तो उस आत्मा को मोक्ष मिल जाता है।
चढ़ावा: मंदिर में भगवान शिव को राख, दूध, दही और नारियल चढ़ाए जाते हैं।
