न्यूज स्कूप : संसद का शीतकालीन सत्र, जो अपने पहले दिन से ही सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक का गवाह रहा, शुक्रवार (19 दिसंबर 2025) को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। हंगामे के बीच सत्र की समाप्ति के बाद, संसदीय परंपरा के अनुसार ‘टी मीटिंग’ (चाय पार्टी) का आयोजन किया गया, जहां सदन की कड़वाहट से इतर एक अलग और सकारात्मक तस्वीर देखने को मिली।
इस औपचारिक बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस महासचिव व सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा, एनसीपी (एसपी) की सुप्रिया सुले सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के दिग्गज नेता शामिल हुए।
टी मीटिंग की सबसे चर्चित बात प्रधानमंत्री मोदी और प्रियंका गांधी के बीच हुई मुलाकात रही। सूत्रों के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच प्रियंका गांधी के निर्वाचन क्षेत्र केरल के वायनाड को लेकर संक्षिप्त लेकिन सौहार्दपूर्ण बातचीत हुई। सदन के भीतर चलने वाली राजनीतिक तल्खी से अलग, इस मुलाकात को काफी सकारात्मक और शिष्टाचार से भरपूर माना जा रहा है।
चाय पार्टी के दौरान सांसदों ने अनौपचारिक रूप से प्रधानमंत्री के सामने कई महत्वपूर्ण बिंदु रखे:
- डेडिकेटेड हॉल की मांग: सदस्यों ने नए संसद भवन में पुराने भवन की तरह एक समर्पित हॉल की मांग की। इस पर चर्चा के दौरान बताया गया कि पुराने भवन में ऐसी व्यवस्था थी, लेकिन उसका उपयोग सीमित था।
- सत्र की अवधि: विपक्षी सांसदों ने कहा कि सत्र को एक हफ्ते और बढ़ाया जा सकता था। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि देर रात तक विधेयकों को पारित करना एक आदर्श स्थिति नहीं है।
- मजाकिया लहजा: जब सांसदों ने सत्र छोटा होने की बात कही, तो प्रधानमंत्री मोदी ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में चुटकी लेते हुए कहा कि वह विपक्ष के विरोध प्रदर्शन के शोर के बीच उनकी आवाज़ पर ज्यादा बोझ नहीं डालना चाहते थे।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस दौरान केरल से क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी (RSP) के सांसद एनके प्रेमचंद्रन के योगदान की खुलकर सराहना की। पीएम ने कहा कि प्रेमचंद्रन जैसे सदस्य सदन में हमेशा पूरी तैयारी के साथ आते हैं और चर्चा के स्तर को ऊँचा उठाते हैं।
शीतकालीन सत्र की शुरुआत से ही अडानी मुद्दे, संभल हिंसा और अन्य राष्ट्रीय विषयों पर विपक्ष के भारी हंगामे के कारण कई बार कार्यवाही बाधित हुई। हालांकि, सत्र के अंतिम दिनों में कुछ महत्वपूर्ण विधायी कार्य पूरे किए गए। टी-पार्टी की इन तस्वीरों ने यह संदेश दिया है कि वैचारिक मतभेदों के बावजूद भारतीय लोकतंत्र में शिष्टाचार और संवाद की परंपरा अभी भी जीवित है।
