न्यूज स्कूप : भारतीय संस्कृति में तुलसी (Holy Basil) के पौधे को साक्षात देवी का स्वरूप माना जाता है। हर सुबह और शाम तुलसी की पूजा करना हमारे संस्कारों का हिस्सा है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बड़े-बुजुर्ग शाम ढलते ही सबसे पहले तुलसी के पास घी या तेल का दीपक जलाने पर इतना जोर क्यों देते हैं? शास्त्रों में इस परंपरा के पीछे न केवल धार्मिक मान्यताएं हैं, बल्कि गहरे मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक कारण भी छिपे हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, पूर्व जन्म में तुलसी का नाम वृंदा था। वह असुर राज जलंधर की अत्यंत पतिव्रता पत्नी थीं। उनकी अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे हमेशा उनके साथ रहेंगी। भगवान विष्णु ने कहा था, “मैं तुलसी के पत्तों के बिना कोई भी भोग स्वीकार नहीं करूंगा और जो तुलसी की सेवा करेगा, वह सीधे मेरे धाम (वैकुंठ) को प्राप्त होगा।” तभी से तुलसी को ‘हरिप्रिया’ कहा जाता है।
शास्त्रों में सूर्यास्त के समय को ‘संधिकाल’ या ‘असुर बेला’ कहा गया है। यह वह समय होता है जब दिन खत्म हो रहा होता है और रात शुरू होती है।
- नकारात्मकता का नाश: पद्म पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, इस संधि काल में नकारात्मक शक्तियां और दरिद्रता की प्रतीक देवी ‘अलक्ष्मी’ सक्रिय होती हैं।
- लक्ष्मी का आगमन: माना जाता है कि संध्या के समय माता लक्ष्मी पृथ्वी पर अपने भक्तों के घर भ्रमण करती हैं। तुलसी के पास जलता हुआ दीपक उस प्रकाश का प्रतीक है जो माता लक्ष्मी का स्वागत करता है और घर की सुरक्षा करता है।
मान्यता है कि जिस घर के आंगन में तुलसी के पास शाम को अंधेरा रहता है, वहां दरिद्रता और कलह का वास होता है। दीपक की लौ नकारात्मक ऊर्जा को घर में प्रवेश करने से रोकती है और एक सकारात्मक ‘ऑरा’ तैयार करती है।
