द लोकतंत्र : हिंदू धर्म की उपासना पद्धति में ‘भोग’ लगाने की परंपरा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। सुबह की आरती हो या मंदिर के बड़े अनुष्ठान, भगवान के सम्मुख फल, मिष्ठान या भोजन अर्पित करना अनिवार्य माना जाता है। अक्सर आधुनिक पीढ़ी के मन में यह प्रश्न उठता है कि “जब भगवान साक्षात भोजन ग्रहण नहीं करते, तो फिर इस प्रक्रिया का क्या औचित्य है?”
शास्त्रों और आध्यात्मिक गुरुओं के अनुसार, भोग लगाना केवल एक रस्म नहीं है, बल्कि यह अन्न शुद्धि, कर्म शुद्धि और मन की पवित्रता से जुड़ा एक गहरा विज्ञान है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर क्यों जरूरी है भोजन करने से पहले भगवान को भोग लगाना।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भोजन में केवल कार्बोहाइड्रेट या प्रोटीन नहीं होता, बल्कि उसमें उसे बनाने वाले के विचार और वातावरण की ऊर्जा भी समाहित होती है।
- अन्न दोष: यदि भोजन क्रोध, ईर्ष्या या अशुद्ध मन से बनाया गया हो, तो वह शरीर में नकारात्मकता फैलाता है।
- प्रसाद का विज्ञान: जब वही भोजन भगवान को अर्पित किया जाता है, तो वह ‘अन्न’ से ‘प्रसाद’ बन जाता है। ईश्वरीय ऊर्जा के संपर्क में आते ही भोजन के भीतर की नकारात्मक तरंगें समाप्त हो जाती हैं और वह सात्विक गुणों से भर जाता है।
भोग अर्पण करने की प्रक्रिया व्यक्ति के भीतर से ‘अहंकार’ को मिटाती है।
- समर्पण: जब हम भगवान को भोग लगाते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि “हे प्रभु, यह अन्न आपकी ही कृपा से प्राप्त हुआ है और मैं इसे पहले आपको ही समर्पित करता हूँ।” यह ‘मैं और मेरा’ की भावना को कम कर विनम्रता लाता है।
- कृतज्ञता: यह ईश्वर के प्रति धन्यवाद प्रकट करने का तरीका है। जो व्यक्ति कृतज्ञ होता है, उसका मन सदैव शांत और प्रसन्न रहता है।
भोग का एक बहुत सुंदर सामाजिक पहलू भी है। एक साधारण उदाहरण से इसे समझा जा सकता है:
यदि आप अपने लिए घर में मिठाई लाते हैं, तो आप उसे अकेले या परिवार के साथ खाते हैं। लेकिन वही मिठाई जब भगवान को भोग लगा दी जाती है, तो वह प्रसाद बन जाती है। फिर आप उसे खुद खाने के बजाय दूसरों को ढूँढ-ढूँढकर बांटते हैं।
यही वह क्षण है जब व्यक्ति के भीतर ‘त्याग और सेवा’ की भावना जन्म लेती है। भोग हमें सिखाता है कि जीवन में जो कुछ भी मिले, उसे साझा करना ही सच्ची मानवता और भक्ति है।
शास्त्रों में कहा गया है कि देवताओं को अर्पित किया गया भोजन ही मनुष्य के लिए उत्तम है।
- मानसिक शांति: भोग लगा हुआ भोजन (प्रसाद) ग्रहण करने से व्यक्ति की बुद्धि सात्विक होती है, जिससे एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।
- भंडारे की परंपरा: मंदिरों में चलने वाले भंडारे इसी ‘साझा करने’ की परंपरा का विस्तार हैं, जो समाज में ऊंच-नीच के भेदभाव को मिटाकर सबको एक पंगत में बिठाते हैं।
भगवान को भोग लगाने का अर्थ उन्हें ‘खिलाना’ नहीं, बल्कि अपनी ‘भक्ति और प्रेम’ को प्रदर्शित करना है। यह एक ऐसी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है जो हमें स्वार्थ से परमार्थ की ओर ले जाती है। इसलिए, अगली बार जब आप भोग लगाएं, तो याद रखें कि आप केवल भोजन नहीं चढ़ा रहे, बल्कि अपनी नकारात्मकता को ईश्वर के चरणों में छोड़कर सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त कर रहे हैं।
