न्यूज स्कूप : देश के उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता और भेदभाव को रोकने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लाए गए नए नियमों को सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने बड़ा झटका दिया है। चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए इन नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है।
अदालत ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि ये नए नियम ‘समावेशी’ होने के बजाय समाज में ‘विभेद’ पैदा करने वाले लग रहे हैं। फिलहाल, वर्ष 2012 में बने पुराने यूजीसी नियम ही सभी कॉलेजों पर लागू रहेंगे।
यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नए नियमों को अधिसूचित किया था। लेकिन इन नियमों की कुछ धाराओं ने बड़े विवाद को जन्म दे दिया:
- नियम 3(c) बनाम 3(e): याचिकाकर्ताओं की दलील है कि नए नियमों की धारा 3(c) केवल एससी (SC), एसटी (ST) और ओबीसी (OBC) वर्ग के साथ होने वाले भेदभाव की बात करती है। जबकि पहले से मौजूद नियम 3(e) में जाति, धर्म, लिंग और क्षेत्र जैसे सभी आधारों पर भेदभाव की मनाही है।
- सामान्य वर्ग की अनदेखी: कोर्ट में दलील दी गई कि नए नियमों में सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों को भेदभाव का शिकार मानने का कोई प्रावधान नहीं है।
- झूठी शिकायत पर चुप्पी: यदि कोई छात्र झूठी शिकायत करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की कोई व्यवस्था नए नियमों में नहीं रखी गई है, जिससे इनके दुरुपयोग की आशंका बढ़ जाती है।
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्य कांत ने समाज की एकता पर चिंता जताते हुए कहा:
- जातिरहित समाज का लक्ष्य: “आजादी के 75 वर्षों में हमने एक जातिरहित समाज बनाने की दिशा में प्रगति की है। क्या ये नए नियम हमें फिर से पीछे ले जा रहे हैं?”
- कैंपस में विवाद का डर: कोर्ट ने चिंता जताई कि यदि कॉलेजों और हॉस्टलों में, जहाँ छात्र एक साथ रहते हैं, वहीं जातीय आधार पर विवाद शुरू हो गए तो समाज किस दिशा में जाएगा।
- सबको मिले संरक्षण: बेंच ने स्पष्ट किया कि चाहे पूर्वोत्तर का छात्र हो या दक्षिण भारत का, यदि उसके साथ किसी भी आधार पर भेदभाव होता है, तो उसे संरक्षण मिलना चाहिए, न कि केवल चुनिंदा वर्गों को।
| विवरण | जानकारी |
| प्रभावी नियम | 2012 के पुराने यूजीसी नियम ही मान्य रहेंगे। |
| विशेष शक्ति | अनुच्छेद 142 के तहत नियमों पर तुरंत रोक। |
| अगली सुनवाई | 19 मार्च 2026 |
| कोर्ट का निर्देश | केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा। |
| संभावित कदम | मामले की जांच के लिए विशेषज्ञ कमेटी बनाई जा सकती है। |
सुप्रीम कोर्ट अब यह देखना चाहता है कि क्या यूजीसी इन नियमों की भाषा को दोबारा इस तरह से तैयार कर सकता है जो सभी वर्गों के लिए न्यायपूर्ण और समावेशी हो। कोर्ट ने संकेत दिया है कि रैगिंग और भेदभाव से लड़ने के लिए कानून सख्त होने चाहिए, लेकिन वे पक्षपाती नहीं होने चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कानून की निष्पक्षता को लेकर एक बड़ी नजीर पेश करता है। अब 19 मार्च की सुनवाई में तय होगा कि यूजीसी अपने नियमों में क्या बदलाव करता है और सरकार का इस पर क्या पक्ष रहता है।
