न्यूज स्कूप : भारत में चाय की टपरी से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल्स तक, यूपीआई (UPI) आज कैश का सबसे बड़ा विकल्प बन चुका है। ‘स्कैन और पे’ (Scan & Pay) की सादगी ने देश की अर्थव्यवस्था को डिजिटल पटरी पर ला खड़ा किया है। लेकिन, बजट 2026 की आहट के बीच यूपीआई के ‘पूरी तरह फ्री’ होने के भविष्य पर सवालिया निशान लग गए हैं।
अक्टूबर 2025 में हुए 20 अरब ट्रांजैक्शन और 27 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड लेनदेन ने जहां एक तरफ सफलता की कहानी लिखी है, वहीं दूसरी तरफ इस सिस्टम को चलाने वाले भारी-भरकम खर्च ने बैंकों और फिनटेक कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है।
देश के डिजिटल इकोसिस्टम में यूपीआई की पैठ का अंदाजा इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है:
- हिस्सेदारी: कुल डिजिटल लेनदेन का लगभग 85 फीसदी हिस्सा अब यूपीआई के जरिए होता है।
- मर्चेंट नेटवर्क: हालांकि पकड़ मजबूत है, लेकिन अभी भी केवल 45 फीसदी व्यापारी ही सक्रिय रूप से यूपीआई का उपयोग कर रहे हैं।
- पिनकोड चुनौती: देश के एक-तिहाई पिनकोड ऐसे हैं जहां 100 से भी कम एक्टिव मर्चेंट हैं, जो ग्रामीण इलाकों में डिजिटल विस्तार की सुस्त रफ्तार को दर्शाता है।
यूपीआई को फ्री रखना अब आर्थिक रूप से एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।
- प्रति ट्रांजैक्शन लागत: एक अनुमान के मुताबिक, हर यूपीआई ट्रांजैक्शन को प्रोसेस करने में बैंकों और फिनटेक कंपनियों को करीब 2 रुपये का खर्च आता है।
- सब्सिडी में कटौती: सरकार ने साल 2023-24 में डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देने के लिए 3,900 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन राशि दी थी। लेकिन, 2025-26 के लिए यह बजट घटकर महज 427 करोड़ रुपये रह गया है।
- भविष्य की जरूरत: आने वाले दो सालों में यूपीआई इंफ्रास्ट्रक्चर को संभालने का कुल खर्च 8,000 से 10,000 करोड़ रुपये तक पहुँचने का अनुमान है।
आरबीआई गवर्नर ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि यूपीआई को अनंत काल तक पूरी तरह मुफ्त रखना संभव नहीं हो सकता। इस सिस्टम की सुरक्षा, नए फीचर्स और ग्रामीण विस्तार के लिए भारी निवेश की जरूरत है।
- फिनटेक कंपनियों का पक्ष: कंपनियों का कहना है कि रेवेन्यू मॉडल न होने के कारण वे इनोवेशन और सुरक्षा में निवेश नहीं कर पा रही हैं।
- मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR): अब मांग उठ रही है कि बड़े व्यापारियों पर मामूली शुल्क लगाया जाए ताकि सिस्टम आत्मनिर्भर बन सके।
| विवरण | वर्ष 2023-24 | वर्ष 2025-26 (अनुमानित) |
| सरकारी प्रोत्साहन (सब्सिडी) | ₹3,900 करोड़ | ₹427 करोड़ |
| कुल ट्रांजैक्शन लागत (अनुमानित) | ₹4,000 करोड़ | ₹9,000 करोड़ |
| ट्रांजैक्शन वॉल्यूम (मासिक) | ~12-15 अरब | ~20 अरब+ |
1 फरवरी को पेश होने वाले बजट 2026 में सरकार के सामने दो मुख्य रास्ते हैं:
- पहला: सरकार सब्सिडी को फिर से बढ़ाकर आम जनता और छोटे दुकानदारों के लिए यूपीआई को पूरी तरह फ्री रखे।
- दूसरा: एक सीमित ट्रांजैक्शन वैल्यू (जैसे ₹2000 से ऊपर) पर मामूली MDR (Merchant Discount Rate) लागू किया जाए, ताकि छोटे वेंडर्स प्रभावित न हों लेकिन बैंकों को रेवेन्यू मिल सके।
यूपीआई भारत की डिजिटल पहचान है। सरकार के लिए चुनौती यह है कि वह इस सिस्टम को टिकाऊ (Sustainable) भी बनाए और यह भी सुनिश्चित करे कि कैशलेस इकोनॉमी की रफ्तार सुस्त न पड़े। बजट 2026 में होने वाला फैसला यह तय करेगा कि आपकी जेब से होने वाला ‘स्कैन’ आगे भी मुफ्त रहेगा या नहीं।
