न्यूज स्कूप : भारतीय संस्कृति में भोजन को केवल शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि ‘साक्षात परब्रह्म’ का रूप माना गया है। हमारे पूर्वजों का मानना था कि “जैसा अन्न, वैसा मन”। हम जिस तरीके से और जिस स्थान पर भोजन करते हैं, उसका सीधा प्रभाव हमारे विचारों, स्वास्थ्य और घर की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।
आज के आधुनिक युग में हम अक्सर ‘डाइनिंग कल्चर’ के नाम पर प्राचीन नियमों को भूलते जा रहे हैं। अनजाने में की गई ये छोटी-छोटी गलतियां घर में नकारात्मक ऊर्जा का संचार करती हैं, जिससे न केवल आर्थिक तंगी आती है, बल्कि पति-पत्नी के रिश्तों में भी कड़वाहट पैदा होने लगती है। आइए जानते हैं वास्तु शास्त्र (Vastu Shastra) के अनुसार भोजन से जुड़े वे महत्वपूर्ण नियम जिनका पालन हर घर में होना चाहिए।
आजकल कई जोड़े प्यार और रोमांस के प्रतीक के रूप में एक ही थाली में भोजन करना पसंद करते हैं। हालांकि, वास्तु शास्त्र और प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, इसे शुभ नहीं माना जाता है।
- भेदभाव की भावना: परिवार के मुखिया की जिम्मेदारी केवल अपनी पत्नी के प्रति ही नहीं, बल्कि माता-पिता, भाई-बहन और बच्चों के प्रति भी होती है। वास्तु के अनुसार, एक ही थाली में खाने से मुखिया का झुकाव केवल पत्नी की ओर अधिक हो जाता है, जिससे वह बाकी सदस्यों की उपेक्षा करने लगता है।
- पारिवारिक कलह: जब मुखिया बाकी सदस्यों के प्रति उदासीन होता है, तो घर में ईर्ष्या और अशांति का जन्म होता है। यह भेदभाव परिवार की एकता को तोड़ता है और नकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देता है, जिसके परिणामस्वरूप घर में बार-बार झगड़े होते हैं।
अक्सर लोग टीवी देखते समय या आलस के कारण बिस्तर पर ही थाली लगाकर बैठ जाते हैं। वास्तु शास्त्र में इस आदत को देवी अन्नपूर्णा और माता लक्ष्मी का घोर अपमान माना गया है।
- राहु का प्रभाव: बिस्तर सोने और आराम करने का स्थान है। यहाँ बैठकर भोजन करने से राहु सक्रिय होता है, जो व्यक्ति की बुद्धि भ्रमित करता है और धन हानि का कारण बनता है।
- लक्ष्मी का वास: ऐसी मान्यता है कि जो लोग बिस्तर पर बैठकर खाना खाते हैं, उनके घर में बरकत खत्म हो जाती है। यह आदत दरिद्रता और आर्थिक अस्थिरता लाती है, जिससे व्यक्ति कर्ज के जाल में फंस सकता है।
यदि आप चाहते हैं कि आपके घर में सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य का वास हो, तो इन नियमों का पालन अवश्य करें:
- दिशा का चुनाव: भोजन करते समय आपका मुख पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर होना चाहिए। इससे स्वास्थ्य बेहतर रहता है और आयु बढ़ती है।
- भूमि आसन: यदि संभव हो तो जमीन पर पालथी मारकर बैठकर भोजन करें। यह पाचन के लिए भी उत्तम है और वास्तु के अनुसार अनुशासित भी।
- कृतज्ञता भाव: भोजन शुरू करने से पहले ईश्वर का धन्यवाद (अन्नपूर्णा स्तुति) जरूर करें। इससे घर में कभी अनाज की कमी नहीं होती।
- स्वच्छता: कभी भी हाथ-पैर धोए बिना भोजन न करें। साथ ही भोजन के बाद थाली में हाथ धोने की गलती कभी न करें, यह धन का नाश करता है।
- सामूहिक अनुशासन: परिवार के सभी सदस्य साथ बैठकर भोजन करें, लेकिन प्रत्येक की अपनी अलग थाली होनी चाहिए। इससे सम्मान और अनुशासन बना रहता है।
भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि संस्कार के लिए भी होता है। वास्तु के इन सरल नियमों को अपनाकर आप अपने घर से क्लेश और दरिद्रता को दूर भगा सकते हैं। याद रखें, अनुशासित जीवन ही समृद्धि का आधार है।
