20 Feb 2026, Fri
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न्यूज स्कूप : आज के दौर में स्मार्टफोन के बाद वायरलेस ईयरफोन (Wireless Earphones) या ब्लूटूथ ईयरबड्स हमारी जिंदगी का सबसे अहम हिस्सा बन गए हैं। चाहे ऑफिस की मीटिंग हो या जिम में वर्कआउट, ये डिवाइस घंटों हमारे कान में लगे रहते हैं। लेकिन इनकी बढ़ती लोकप्रियता के साथ ही एक डर भी सोशल मीडिया पर तेजी से फैल रहा है— “क्या ब्लूटूथ ईयरफोन से कैंसर होता है?”

हाल ही में इंटरनेट पर कुछ ऐसे दावे वायरल हुए जिनमें कहा गया कि इन ईयरफोन को पहनना अपने मस्तिष्क के पास एक छोटा ‘माइक्रोवेव’ चलाने जैसा है। इन दावों ने आम जनता के मन में घबराहट पैदा कर दी है। लेकिन क्या इन बातों में कोई वैज्ञानिक सच्चाई है? आइए जानते हैं प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन की राय और इस विषय पर हुए शोध क्या कहते हैं।

एक्सपर्ट की राय: माइक्रोवेव वाली तुलना कितनी सही?

इस भ्रम को दूर करने के लिए अमेरिका के मिशिगन न्यूरोसर्जरी इंस्टीट्यूट के न्यूरोसर्जन डॉ. जय जगन्नाथन ने वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर स्थिति स्पष्ट की है। उन्होंने हाल ही में एक वीडियो के जरिए बताया कि एयरपॉड्स या किसी भी ब्लूटूथ ईयरफोन को माइक्रोवेव कहना पूरी तरह से भ्रामक है।

  • नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन (Non-Ionizing Radiation): डॉ. जगन्नाथन के अनुसार, वायरलेस ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन ‘नॉन-आयोनाइजिंग’ श्रेणी का होता है। इस तरह के रेडिएशन में इतनी ऊर्जा नहीं होती कि वह हमारे डीएनए (DNA) को नुकसान पहुँचा सके। कैंसर तभी होता है जब रेडिएशन कोशिकाओं के डीएनए को बदल दे, जो कि ब्लूटूथ ईयरफोन के मामले में संभव नहीं माना जाता।

मोबाइल फोन vs ब्लूटूथ ईयरफोन: रेडिएशन का अंतर

वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, ब्लूटूथ ईयरफोन से निकलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन की तुलना में बहुत कम होता है।

  • तुलनात्मक अध्ययन: एयरपॉड्स जैसे डिवाइस से निकलने वाला रेडिएशन मोबाइल फोन के मुकाबले 10 से 400 गुना तक कम हो सकता है।
  • सुरक्षा: डॉ. जगन्नाथन का तर्क है कि यदि दशकों से मोबाइल फोन के इस्तेमाल के बावजूद कैंसर का कोई ठोस और व्यापक प्रमाण नहीं मिला है, तो ईयरफोन से होने वाला जोखिम नगण्य (Minimal) है।

क्या कहती है चूहों पर हुई वो चर्चित रिसर्च?

कैंसर के दावों के पीछे अक्सर नेशनल टॉक्सिकोलॉजी प्रोग्राम (NTP) की एक स्टडी का हवाला दिया जाता है।

  1. स्टडी का निष्कर्ष: इस अध्ययन में चूहों को बहुत अधिक रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन के संपर्क में रखा गया था, जिससे कुछ नर चूहों में हृदय कैंसर के लक्षण दिखे थे।
  2. FDA की समीक्षा: अमेरिकी फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने इस स्टडी की समीक्षा की और पाया कि इसके परिणामों को सीधे इंसानों पर लागू नहीं किया जा सकता। चूहों को जिस स्तर का रेडिएशन दिया गया था, वह वास्तविक जीवन में ईयरफोन इस्तेमाल करने से मिलने वाले रेडिएशन से कहीं ज्यादा था।

सावधानी ही सुरक्षा है

हालांकि कैंसर का खतरा साबित नहीं हुआ है, लेकिन घंटों ईयरफोन लगाए रखने से अन्य समस्याएं हो सकती हैं:

  • कान का संक्रमण: लंबे समय तक कान बंद रहने से नमी जमा होती है, जिससे बैक्टीरिया पनप सकते हैं।
  • सुनने की क्षमता पर असर: अगर आप बहुत तेज आवाज में संगीत सुनते हैं, तो यह आपके कान के पर्दों को नुकसान पहुँचा सकता है।
  • समय का ध्यान रखें: एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि ईयरफोन का उपयोग जरूरत के समय ही करें और हर एक घंटे के बाद कानों को थोड़ा विश्राम दें।

मौजूदा वैज्ञानिक प्रमाणों और डॉ. जगन्नाथन जैसे विशेषज्ञों के अनुसार, वायरलेस ईयरफोन कैंसर का कारण नहीं बनते हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे दावे डराने वाले जरूर हैं, लेकिन उनमें वैज्ञानिक आधार की कमी है। आप बेफिक्र होकर इनका इस्तेमाल कर सकते हैं, बस अपनी सुनने की क्षमता और स्वच्छता का ध्यान रखें।

By News Scoop Desk

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